मंगलवार, 13 अगस्त 2013

स्थाई कार्यक्रम : शब्दम् बालिका पाठशाला

                                                                      शब्दम् बालिका पाठशाला


पाठशाला में बालिकाओं एवं महिलाओं को शिक्षण प्रदान करते हुए शिक्षिका


       शब्दम् की ‘बालिका पाठशाला’ योजना गत वर्ष से संचालित की जा रही है। इसका उद्देश्य स्कूल नहीं जा सकी अथवा स्कूल छोड़ कर घर बैठ गई बालिकाओं एवं महिलाओं को सामान्य हिंदी पढ़ना व लिखना सिखाना और घरेलू या अपने कामकाज का हिसाब लगाने के लिए जरूरी गणित सिखाना है।  पाठशाला में छह माह की अवधि का एक सत्र होता है। जिसे आवश्यकता के अनुरूप किसी उपयुक्त स्थान शुरू किया जा सकता है।
इस बार का सत्र शिकोहाबाद के एक नितांत दलित आबादी वाले गांव नगला भीमसेन मंे प्रारंभ किया गया है। आरंभ होने से पहले गांव का सर्वे कर आवेदन मांगे गए। गांव की 14 बालिकाओं और महिलाओं ने पाठशाला में प्रवेश पाने के लिए आवेदन किया। ये वे महिलाएं या बालिकाएं थीं जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था या कुछ समय स्कूल जाने के बाद वे निरंतर नहीं हो सकी थीं। यह गांव लगभग दो शताब्दी पुराना बताया जाता है लेकिन इसके विकास की आज तक किसी ने सुधि नहीं ली है। ऐसे में शब्दम् पाठशाला के प्रयास का गांव वालों ने उत्साह से स्वागत किया। कुछ ही दिन में यहां विद्यार्थिनों की संख्या 21 हो गई।
    इस पाठशाला का आरंभ सुबह की प्रार्थना के साथ होता है और इसके लिए 6 माह का विशेष पाठ्यक्रम शब्दम् के लोगों द्वारा ही बनाया गया है। जिसमें हिन्दी का अक्षर, शब्द और स्वर-व्यंजन का ज्ञान, लिखने-पढ़ने का अभ्यास आदि शामिल हैं। गणित में अंक ज्ञान, उनकी पहचान, लिखने और पढ़ने का अभ्यास, सौ तक गिनती, दस तक पहाड़े। जोड़, गुणा, घटना और भाग सिखाया जाता है।
     इसके अलावा ज्ञानवर्द्धक, नैतिक एवं रुचिकर कहानियों के माध्यम से नैतिक ज्ञान, स्वास्थ्य और स्वच्छता की शिक्षा भी दी है।
     शिक्षण के लिए एक स्नातक महिला को नियुक्त किया गया है। शब्दम् के पदाधिकारी समय-समय पर अवलोकन और दिशा निर्देशन देते हैं। कमजोर बालिकाओं के लिए अतिरिक्त कक्षा भी ग्रामवासियों ने इसके लिए एक निशुल्क भवन प्रदान किया है। सफाई और भवन के रखाव आदि व्यवस्थाओं मंे ग्रामवासी पूरे उत्साह से सहयोग करते हैं।
    शब्दम् पाठशाला का यह छोटा सा प्रयास, घोर तिमिर में एक दीप जलाने जैसा है। हमारे गांवों से अशिक्षा के अंधकार को हटाने के लिए सरकारी और गैरसरकारी निगमों और संगठनों को आगे आना चाहिए। सभी को मिल कर इस स्थिति के विरूद्ध कमर कस कर कार्य करना होगा, तभी सच्चे मायने में समाज और देश की सेवा को चरितार्थ किया जा सकेगा।


                                                                 छठवां ग्रामीण कवि सम्मेलन


कवि सम्मेलन में काव्यपाठ करते हुए कवयित्री श्रीमती नीलम

     हमेशा की तरह गांव मंे होने वाला ‘शब्दम’ ग्रामीण कवि सम्मेलन जसराना तहसील के बनवारा गांव में 22 जून 2013 को संपन्न हुआ। इसके माध्यम से बड़ी संख्या में दूरदेहात के लोगों ने साहित्य और काव्य के संस्कार को नजदीक से जाना और विभिन्न रस की कविताओं का सुबह से शाम तक आनंद लिया।

     आयोजन की गहमागहमी सुबह से ही रही। उम्मीद के विपरीत मौसम ने साथ दिया। गांव वालों ने जोश के साथ सहभागिता की। वे हिन्दी की कविता को सुनने एवं उनको रचने वालों का दर्शन करने को आतुर दिखाई दिए।
 काव्यपाठ करते हुए कवि श्री शिवसागर शर्मा
   इस आयोजन हेतु ‘शब्दम्’ ने ग्रामीण परिवेश की रचनाओं के लिए उपयुक्त कवियों को आमंत्रित किया। ओज कवि श्री रामनरेश रमन (झांसी), गीतकार श्री शिवसागर शर्मा (आगरा), श्री बलराम श्रीवास्तव (किशनी) एवं श्रीमती नीलम नीरजा (ग्वालियर) के अलावा हास्य-व्यंग्य के कवि श्री गोविंद पटवारी (धौलपुर) को आमंत्रित किया था। कवियों ने अपने-अपने रस और विधा की रचनाएं प्रस्तुत कर ग्रामीण श्रोताओं का मन मोहित किया। युवाओं के मन में ओजस्वी कविताओं ने देश प्रेम की ज्वाला फूंकी। गीतों ने संस्कृति, प्रकृति और श्रंगार आदि विषयों पर श्रोताओं को सिक्त किया। वहीं हास्य की रचनाओं ने भी लोगों को खूब गुदगुदाया। 

 कवि सम्मेलन में कविताओं का रसास्वादन करते हुए महिलाएं एवं पुरुष श्रोता
शब्दम् अध्यक्षा श्रीमती किरण बजाज ने मुंबई से फोन के द्वारा ग्रामीणों को संबोधित किया। उन्होंने ग्रामवासियों का आह्वान किया कि अब देश की किस्मत गांव के हाथ में है। संस्कृति और प्रकृति की सभ्यता गांव से ही शुरू हुई है इसलिए गांव को जागरूक होकर हिन्दी भाषा और संस्कृति को बचाना होगा। शब्दम उपाध्यक्ष श्री नंदलाल पाठक द्वारा भेजी गई काव्य पंक्तियों का वाचन किया गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह ने भी श्रोताओं को फोन से संबोधित किया। उन्होंने गांव वालों के उत्साह की प्रशंसा की और अपनी कुछ रचनाएं भी सुनाईं।

 मुख्य अतिथि के रूप में डा० ओ.पी. सिंह ने आभार प्रकट करते हुए आयोजन को सफलतम बताया।




शनिवार, 4 मई 2013

कला को मा़त्र मनोरंजन का साधन बनाना घातक: डा० आनंदा शंकर जयंत


                                          कला के माध्यम से ईश्वर को भी पा सकते हैं
                             फिल्मों ने कला के स्तर को क्षति पहुंचाई
                                                                       
                                                                           -  डा० आनंदा शंकर जयंत

 डा० आनंदा शंकर जयंत
    शिकोहाबाद।भरतनाट्यम्‌ और कुचिपुडि नृत्य की विश्वविख्यात नृत्यांगना पदमश्री आनंदा शंकर जयंत का मानना है कि कला को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम मान लेना बडी भूल है। कला के माध्यम से पूरे जीवन और समाज का कल्याण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि व्यवसायिकता की अंधी दौड में फिल्मों ने कला को ग्लैमर में बदल दिया है।
आनंदा शंकर ने कहा कि नृत्यकला मात्र शरीर को कुछ आकृतियों और लयताल के साथ मंच पर प्रस्तुत कर देना नहीं है। कोई भी संस्कृति या कला, व्यक्ति या उसके समाज की पारिभाषा होती है। संस्कृति से पूरे समाज की पहचान बनती है। उन्होने कहा कि नृत्य उनके लिए परमेश्वर के समीप जाने का माध्यम है।

शिकोहाबाद के हिन्दलैंप्स में शब्दम्‌ और स्पिक मैके के सहयोग से शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति के लिए आईं आनंदा शंकर ने मीडिया से बातचीत में अपने मन की बातें रखीं। उन्होंने आज के नृत्य को भौंडा प्रदर्शन बताया और कहा कि इसका उददेश्य मात्र मनोरंजन है। हालांकि अब तो स्वस्थ्य मनोरंजन मिलना भी कठिन होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि कला की अमूल्य धरोहर को सिर्फ मनोरंजन का साधन बना देना सही नहीं है।
देश-विदेश में अनेक कार्यक्रम देकर भारत की संस्कृति को सम्मान दिलाने वाली आनंदा ने कहा कि नृत्य न तो उनकी अभिरूचि है और न ही करियर। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए समय पास करने का माध्यम भी नहीं है। डांस मेरे लिए मेरा ईश्वर को पाने का साधन है। उन्होने कहा कि अगर कोई भी कलाकार अपनी प्रतिभा के साथ साधना का भाव जोड लेता है और उसे सच्चे अर्थ में साकार करने कोशिश करता है तो कला अलौकिक उददेश्यों की पूर्ति भी करती है। उन्होंने कहा कि नृत्य वह है जो करने वाले और देखने वाले, दोनों ही लोगों को आत्मा तक आनंद की यात्रा को ले जाए।


शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत करतीं आनंदा शंकर जयंत





                                                          नृत्य के साथ अभिनय का बेजोड संगम  
                                                           हिन्दलैंप्स, शिकोहाबाद के संस्कृति भवन में आयोजन 

नृत्य की भावपूर्ण मुद्रा में  आनंदा शंकर जयंत



आनंदा शंकर जयंत की कला के जादू ने हिंदलैंप्स परिसर में दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।  पद्मश्री अलंकरण से अलंकृत आनन्दा शंकर की  प्रस्तुति केवल शास्त्रीय नृत्य तक ही सीमित नहीं थी, उसमें नाटकीय अभिनय का भी व्यापक समावेश था। उन्होंने आधादर्जन प्रस्तुतियों से मंत्रमुग्ध कर दिया।

हिंदलैंप्स के संस्कृति भवन में डीएम संध्या तिवारी ने समारोह का शुभारंभ किया। बजाज इलैक्टीकल्स के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक शेखर बजाज और शब्दम्‌ की अध्यक्ष श्रीमती किरण बजाज ने डाॅ आनंदा शंकर और उनके साथी कलाकारों का स्वगात किया। इस मौके पर मौजूद तमाम स्कूली

समारोह का शुभारंभ करने के बाद आनंदा शंकर का स्वागत करते हुए शब्दम् अध्यक्षा श्रीमती किरण बजाज और फीरोजाबाद की जिला मजिस्टेट श्रीमती संध्या तिवारी



बच्चों को महान कलाकार ने एक आदर्श शिक्षक की तरह नृत्यकला के गुर भी बताए। उन्होंने बताया कि भरतनाट्यम्‌  और  कुचिपुडि नृत्य की विधाएं देश की सांस्कृति की  आत्मा हैं। एक विधा पूरब से और दूसरी दक्षिण भारत से संबंध रखती है। उन्होंने कहा कि भरतमुनि द्वारा रचित नाटयशास्त्र ही नृत्यकला का मूल श्रोत है। भरतमुनि को यह विद्या ब्रह्माजी ने दी।
आनंदा ने कहा कि नृत्य मानव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। हर रोज, हर शख्स नाचता है। उसकी आम दिनचर्या के कई हावभाव नाच की श्रेणी में हैं। लेकिन उनका प्रकटीकरण एक क्रम में नहीं होने से उन्हें स्पष्ट रूप से नृत्य नहीं कहा जा सकता है। कुचिपुडि और भरतनाट्यम्‌    के अंतर को भी उन्होंने मुद्राओं के उदाहरण देकर समझाया।

कृष्ण के रोने का जीवंत रूप प्रस्तुत करतीं आनन्दा  शंकर  जयंत
संबोधन के बाद जैसे ही आनंदा ने नृत्य की भाव भंगिमाआंे को प्रस्तुत किया वैसे ही दर्शक मंत्रमुग्ध होकर उनकी कला में खो गए। कृष्ण की माखनचोरी लीला पर नृत्य के अभिनय से उन्होंने शुरुवात की। मटकी तोड कर ग्वालबालों के संग माखन लूट लेना और बचा हुआ गोपी के मुंह पर पोत कर भाग जाना। इसके बाद गोपी का कृष्ण को पकडने के लिए भागना। लीला के प्रत्येक पात्र के रूप में सिर्फ एक कलाकार द्वारा दी गई प्रस्तुति को देख हाल में लगातार तालियों की गडगडाहट गूंजती रही।

विश्वविख्यात नृत्यांगना ने गिरिराज को अंगुली पर उठाने का प्रसंग प्रस्तुत किया तो मिथिला के धनुष-यज्ञ को भी साकार किया। वहीं महाभारत के प्रसंग द्रोपदी के चीरहरण के माध्यम से करूणा का वातावरण बना दिया। अंत में उन्होंने स्कूली बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान और प्रश्नों के उत्तर भी दिए।

समारोह की आयोजक शब्दम्‌ अध्य्क्ष   श्रीमती किरण बजाज ने सहयोगी संस्था स्पिक मैके, कलाकार मंडल और अतिथियों का स्वागत किया।शब्दम सलाहकार मंडल के सदस्य  डा० महेशं आलोक ने कला और कलाकारों का विस्तार से परिचय दिया। मुकेश मणिकांचन ने संचालन किया। सहायक श्रमायुक्त राजेश मिश्रा, प्रभागीय वनाधिकारी परमानंद यादव, डा० ए ०के० आहूजा, अरविंद तिवारी के अलावा ज्ञानदीप सीनियर सैकेंडरी स्कूल, शांतिदेवी आहूजा महाविद्यालय, ब्राइट स्कालर्स एकेडमी, देवभूमि पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों ने सहभागिता की।



                         
डा० आनंदा शंकर जयंत के साथ सहयोगी कलाकार, बजाज इलैक्टीकल्स के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री शेखर बजाज,शब्दम् अध्यक्षा श्रीमती किरण बजाज,  शब्दम्‌ सलाहकार मंडल के सदस्य  डा० महेशं आलोक, डा० ए ०के० आहूजा, अरविंद तिवारी आदि




शनिवार, 1 दिसंबर 2012

नवउदारवाद, बाजारवाद और अवसरवादी राजनीति ने हिन्दी को बहुत पीछे धकेल दिया है-डा. वेदप्रताप वैदिक


नवउदारवाद, बाजारवाद और अवसरवादी राजनीति ने हिन्दी को बहुत पीछे धकेल दिया है-डा0. वैदिक



डा0 वैदिक बोलते हुए साथ में बैठे हुए बाएं उदयप्रताप सिंह तथा दाएं शब्दम् अध्यक्ष श्रीमती किरन बजाज


कार्यक्रम विषय - हिन्दी मीडिया से वर्तमान एवं भविष्य को उम्मीदें तथा हिन्दी सेवी सम्मान
दिनांक     - 17 नवम्बर 2012
संयोजन             - शब्दम्
आमंत्रित अतिथि - डा0 वेदप्रताप वैदिक, श्री उदयप्रताप सिंह
विशिष्ट अतिथि - शब्दम सलाहकार मंडल के सदस्य श्री उमाशंकर शर्मा, श्री मंजर उलवासै, डा0. ओ.पी. सिंह, डा0. महेश आलोक,  डा0. ध्रुवेन्द्र भदौरिया, डा0 रजनी यादव, श्री मुकेश मणिकान्चन एवं श्री बाल कृष्ण गुप्त, श्री अंशुमान बावरी, डा. सुशीला त्यागी, डा0 नरेन्द्र प्रकाश जैन, डा0. ए.बी. चैबे।
      
         शब्दम् का आठवां स्थापना दिवस पूर्णतः हिन्दी विमर्श को समर्पित था। इस अवसर  पर संस्था द्वारा हिन्दी के अग्रणी पैरोकार डा. वेदप्रताप वैदिक और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह को उनकी हिन्दी सेवा के लिए सम्मानित किया गया।।
 
डा0 वैदिक एवं उदयप्रताप सिंह को सम्मानित करतीं शब्दम् अध्यक्ष श्रीमती किरन बजाज एवं शब्दम् सलाहकार मंडल के सदस्य
         
शब्दम् अध्यक्ष श्रीमती किरन बजाज बोलते हुए
                कार्यक्रम अदभुत और अनूठा इसलिए भी बन गया क्योंकि ‘शब्दम्’ संस्था संगीत के साथ साहित्य को समर्पित संस्था भी है। संस्था की अध्यक्ष श्रीमती किरण बजाज ने जब एल.सी.डी. के जरिए संस्था के कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया तो हिन्द लैम्पस् संस्कृति भवन में उपस्थिति बुद्धिजीवियों ने करतल ध्वनि से उसकी सराहना की। विगत वर्षों में संस्था द्वारा किए गए कार्यों में, चाहे वह ग्रामीण कवि सम्मेलन के जरिए हिन्दी की अलख जगाने का कार्यक्रम हो या पर्यावरण जागरूकता का हिन्दी सेवियों के सम्मान की श्रंखला हो या म्यूजिक कंसर्ट के कार्यक्रम, सभी कार्यक्रम समाज सेवा के यज्ञ में एक से बढ़कर एक आहुति के समान दिखाई दे रहे थे।     एस.सी.डी. के चित्रों की जीवन्तता ने सभी दर्शकों का मनमोह लिया। श्रीमती किरण बजाज ने इस प्रजेंटेशन के जरिए यह तो साबित कर ही दिया कि शब्दम् संस्था हर वर्ष नए प्रतिमान गढ़ रही है, जिनका लाभ न केवल फिरोजाबाद अंचल अपितु पूरे आगरा संभाग को मिल रहा है। संस्था के सुरूचिपूर्ण प्रबन्धन और कर्मठ कार्यकर्ताओं की सक्रियता के चलते पर्यावरणीय प्रदूषण के साथ ही सांस्कृतिक प्रदूषण को दूर करने में संस्था का प्रयास श्लाघनीय है।
अपने सम्मान से अभिभूत जब डा. वेदप्रताप वैदिक हिन्दी विमर्श पर बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने उदयप्रताप जी को सम्बोधित करते हुए कहा ‘‘मेरे जीवन की अविस्मरणीय सभा के अध्यक्ष जी मुझे आज यहा आकर बेहद प्रसन्नता हो रही है’’ दरअसल ‘शब्दम्’ का हिन्दी भाषा से बेहद लगाव है यही कारण है कि 2012 के शिक्षक दिवस पर सम्मानित होने वाले प्रो. नामवर सिंह जी भी गदगद हो गए थे।
अपने उद्बोधन के प्रारंभ में ही डा. वैदिक ने स्पष्ट कर दिया था कि वह केवल हिन्दी भाषा की स्थिति पर ही विमर्श को केन्द्रित करने का प्रयास करेंगे और बाद में उन्हों किया भी यही। वैदिक इस बात को लेकर बेहद आहत दिखे कि देश में चहुंओर अंग्रेजी का बोलबाला है। हिन्दी के प्रति दिलचस्पी न तो राजनेताओं में है और न उद्योगपतियों में। अंग्रेजी के आगे सम्पूर्ण भारतीय समाज भृत्य बनकर रह गय है। ‘‘अंग्रेजी के ऐसे घटाटोप में शब्दम् संस्था का हिन्दी प्रेम देखकर मुझे लगा जैसे शिकोहाबाद में कोई दाराशिकोह की तरह दीप जलाए बैठा है।’’ देश के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अंग्रेजी सीखने को ‘पांडित्य’ समझता है। अंग्रेजी का ऐसा घटाटोप ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भी देखने को नहीं मिला।
डा. वैदिक ने बताया कि वह पहले विद्यार्थी थे जो हिन्दी में शोधग्रन्थ लिखकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रस्तुत कर सके। प्रारंभ में उनके शोध को स्वीकार नहीं किया गया। नवउदारवाद, बाजारवाद और अवसरवादी राजनीति ने हिन्दी को बहुत पीछे धकेल दिया है। महात्मागांधी और डा. राम मनोहर लोहिया के बाद कोई ऐसा राजनेता सामने नहीं आया है जो हिन्दी के लिए संघर्ष कर सके। डाॅ. वैदिक ने स्पष्ट किया कि वह अंग्रेजी विरोधी नहीं है। उनकी कई पुस्तकें अंग्रेजी में लिखी गयी हैं तथा वह विदेशों में अंग्रेजी में व्याख्यान देते हंै लेकिन जिस तरह अंग्रेजी भारतवासियों पर थोपी जा रही है उसका वह विरोध करते है। उनका मानना है कि इस अंग्रेजी की वर्चस्वता के चलते देश में साठ करोड़ लोग बीस रू. से कम खर्च पर प्रतिदिन गुजारा करते हुए पशुवत जीवन जीने को विवश है। सेना का यह हाल है कि वहाॅं बहादुरी से गोलियां चलाने वाले का सम्मान नहीं होता, बल्कि अंग्रेजी में जुबान चलाने वाले का सम्मान किया जाता है। देश के अनुसंधान पर भाषा के माध्यम का असर पड़ रहा है। भारतीय प्रतिभाएं अपनी प्रतिभा का उपयोग पहले अंग्रेजी साीखने में करती हैं उसके बाद ही अनुसंधान की ओर बढ़ पाती है। अंग्रेजी के तिलिस्म के चलते गरीब भारतवासी का बच्चा आगे नहंी बढ़ पाता। उन्होंने भारतवासियों के अंग्रेजी प्रेम पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जो बच्चा अपनी मां (हिन्दी) को मां कहने में संकोच करता है वह मौसी (अंग्रेजी) की क्या इज्जत करेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उदयप्रताप जी को इंगित करते हुए वैदिक जी ने कहा कि आप हिन्दी संस्थान के जरिए ज्ञान-विज्ञान की श्रेष्ठ किताबों के हिन्दी अनुवाद का काम करवाइए ताकि छात्र-छात्राओं को लाभ मिल सके। अनुवाद के जरिए आप बहुत बड़ा काम कर सकते हैं।
उद्बोधन के अंत में डा. वैदिक ने श्रोताओं द्वारा उठाए गए प्रश्नों का समाधान भी प्रस्तुत किया।
डा0 महेश आलोक उदयप्रताप सिंह का परिचय देते हुए
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उ.प्र. हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदयप्रताप ने आश्वासन दिया कि वह हिन्दी संस्थान में रहते हुए हिन्दी के प्रचार-प्रसार और संवर्द्धन का काम करेंगे। उदयप्रताप ने डा. वैदिक से सम्बन्धित कुछ रोचक संस्मरण भी सुनाए जिनका श्रोताओं ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। संस्था की अध्यक्ष किरण बजाज ने आग्रह पर उन्होंने अपनी गजल के कुछ शेर सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
 डा0 ओ0 पी0 सिंह डा0 वैदिक का परिचय देते हुए
कार्यक्रम के प्रारंभ में डा. ओ.पी. सिंह एवं डा.महेश आलोक ने क्रमश:

डा. वैदिक एवं उदयप्रताप सिंह के व्यक्तिव और कृतित्व पर प्रकाश डाला।तथा डा0 ध्रुवेन्द्र भदौरिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन मुकेश मणिकांचन ने किया।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

वैदिक काल में आवास-व्यवस्था - महेश आलोक


       आवास व्यवस्था  किसी भी संस्कृति का एक महत्व्पूर्ण अंग है। यह सर्वमान्य है कि आवासों का निर्माण एवं उसका स्वरूप उसके निर्माताओं की आवश्यकताओं एवं चतुर्दिक पर्यावरण पर  आधारित होता है। इसके अतिरिक्त निर्माण हेतु उपलब्ध सामग्री एवं संस्कृतियों का तकनीकी स्तर भी आवास निवेश को एक बड़ी सीमा तक प्रभावित करते हैं। वैदिक संहिताओं में इस विषय से संबन्धित सामग्री सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। हमें केवल ग्राम, गृह या पुर जैसे कुछ शब्दों के रूप में ही सूचनाएं प्राप्त होती हैं। इन शब्दों को तत्कालीन पर्यावरण तथा सामाजिक आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है।
      वैदिक सहिताएं आर्यन संस्कृति की जानकारी हेतु प्राचीनतम लिखित प्रमाण हैं। इस दृष्टि से इनका ऐतिहासिक महत्व समस्त विश्व में स्वीकार किया जाता है। मूल संहिताएं ऋक, यजु, साम एवं अथर्व, केवल चार ही हैं। किन्तु कालान्तर में कुछ उपशाखाओं का उदय हुआ जिन्होंने भिन्न सहिताओं का निर्माण किया। वाजसनेयि, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक आदि संहिताएं इनका प्रमाण हैं। यों तो वैदिक संहिताओं के काल को लेकर विद्वानों के मध्य अत्यधिक मतभेद है तथापि इस संदर्भ में जर्मन विद्वान ‘विन्टरनित्स’1 का मत अपेक्षाकृत अधिक तर्कसंगत स्वीकार किया जाता है। इसी को आधार मानकर संहिताओं का काल लगभग द्वितीय सहस्त्राब्दी ईस्वी पूर्व निर्धारित किया जा सकता है। यह तो सर्वविदित है कि ऋग्वेद संहिता अन्य वैदिक सहिताओं की अपेक्षा अधिक प्राचीन है।
      अबतक अधिकांश विद्वानों की प्रायः यही धारणा रही है कि आरम्भिक वैदिक संस्कृति का आर्थिक मूल आधार पशुपालन था और कालान्तर में इसके अतिरिक्त कृषि भी जीवन यापन का मुख्य साधन बन गयी। जीवन यापन की इन मौलिक आवश्यकताओं को देखते हुए यह स्वीकार किया जा सकता है कि वैदिक आर्यों ने उन्हीं स्थलों को निवास के लिये चुना होगा जहां इन दोनों से सम्बन्धित सुविधाएं उपलब्ध हों। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे समतल कृषि योग्य स्थलों को ही निवास निमित्त चुना गया होगा जिसमें पर्याप्त वर्षा होती हो अथवा नदी झील या तालाब का जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो। इस प्रकार के वातावरण या पर्यावरण में न तो चरागाहों का अभाव होगा और न ही ऐसे जंगलों का जिनमें आखेट योग्य पशु काफी संख्या में उपलब्ध हों।
     संहिताओं में आखेट के उल्लेख स्पष्ट करते हैं कि यह न केवल मनोविनोद का साधन था वरन् वैदिक अर्थव्यवस्था का भी एक महत्वपूर्ण अंग था। इसी प्रकार ऐसे भी उल्लेख हैं जिनमें पशुओं के ‘चरागाह’ (व्रजम्) एवं गोष्ठ ( गायों के खड़े होने का स्थान ) हैं।2 वैदिक मन्त्रों में इन्द्र, वरूण आदि देवताओं से वर्षा की प्रार्थना की गयी है,3 इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि कभी कभी वैदिक आर्यों के निवास क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं होती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि जलवायु लगभग उसी प्रकार की थी जैसी उत्तरी भारत में वर्तमान समय में होती है।
      जैसा कि उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वैदिक संस्कृत संहिता काल में पशुपालन आधारित आर्थिक व्यवस्था सीमित कृषि पर आधारित थी। ऐसी स्थिति में छोटी छोटी बस्तियों का यत्र- तत्र विद्यमान होना ही अघिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। संहिताओं का ग्राम ( मन्$ग्रस्) शब्द इन्हीं का द्योतक है। नगरों के विकास के लिये , जैसा कि आज समझा जाता है, विकसित उद्योग, समुचित व्यापार व्यवस्था एवं सुव्यवस्थित राजनैतिक प्रणाली का होना आवश्यक है। इसके अभाव में हम नगरों की कल्पना नहीं कर सकते। संहिताओं का ‘पुर’ शब्द स्वाभाविक रूप से नगरों का न होकर अन्य सुरक्षा सम्बन्धी निर्माण का द्योतक प्रतीत होता है। यही बात ‘दुर्ग’ के सम्बन्ध में नहीं कही जा सकती। गांवों में निवास निमित्त विविध आवश्यकताओं के अनुरूप ‘गृह’ निर्मित किये जाते थे। वस्तुतः आवास व्यवस्था से सम्बन्धित ‘ग्राम’, ‘गृह’, ‘पुर’ जैसे प्रचलित शब्द ही वैदिक संहिताओं में उपलब्ध हैं।
                   ..........................................................                                            
संदर्भ ग्रंथ सूची-
1.  विन्टरनित्स एम0- ए हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर  (अंग्रेजी अनुवाद)-  कलकत्ता- 1959
2.  व्रजम् ऋ0 10।26।3, 10।97।10 एवं 10।101।8,
    गोष्ठ  ऋ0 1।191।4, 6।28।1, 8।3।17,
    सेंट पीटर्स बुर्ग कोष के अनुसार ‘गोष्ठ’ का अर्थ है-पशुओं या गायों के खड़े होने का स्थान
3. ऋ0 4।57।7-9



Shabdam Foundation Day




सोमवार, 17 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस पर विशेष- किरण बजाज